Saturday, August 29, 2026

असम में बीजेपी की जीत में दो लफ्जों का कमाल मामा और मियां

असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने एक बात शीशे की तरह साफ कर दी है। नॉर्थ-ईस्ट की राजनीति के ‘किंग’ हिमंत बिस्वा सरमा ही हैं। बीजेपी जिस तरह से असम में जीत की हैट्रिक लगाने जा रही है। उसने दिल्ली से लेकर गुवाहाटी तक के सियासी पंडितों को हैरान कर दिया है। इस जीत की स्क्रिप्ट किसी फिल्मी ब्लॉकबस्टर से कम नहीं है। जिसके केंद्र में दो ही शब्द सबसे ज्यादा गूंजे- ‘मामा’ और ‘मियां’।
एक तरफ हिमंत राज्य की महिलाओं में ‘मामा’ बन गए। जो कि एक कामयाब इमोशनल कार्ड बन गया। तो दूसरी तरफ ‘मियां’ पॉलिटिक्स को टारगेट कर ऐसा ध्रुवीकरण किया कि विपक्ष के पास डिफेंस का कोई मौका ही नहीं बचा।
असम में आज छोटे बच्चे हों या बुजुर्ग महिलाएं, सबके लिए हिमंत बिस्वा सरमा सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि ‘मामा’ हैं। राजनीति में अक्सर नेता खुद को ‘सेवक’ या ‘प्रधान’ बताते हैं, लेकिन हिमंत ने ‘पारिवारिक रिश्ता’ कायम किया। इस ‘मामा’ ब्रैंडिंग के पीछे छिपा था महिलाओं का एक बहुत बड़ा और वफादार वोट बैंक।
हिमंत ने समझा कि अगर घर की महिला खुश है, तो वोट कहीं नहीं जाएगा। उनकी ‘अरुणोदयी 2.0’ और अन्य कैश ट्रांसफर स्कीम ने सीधे बहनों और भांजियों के बैंक खातों में पैसा पहुंचाया। जब चुनाव करीब आए, तो इन योजनाओं का बजट और दायरा दोनों बढ़ा दिए गए। कांग्रेस महंगाई को मुद्दा बनाती रही, लेकिन ग्रामीण महिलाओं के लिए ‘मामा’ की ओर से आने वाली यह डायरेक्ट मदद एक बड़ा सहारा बन गई। इस फाइनेंशियल पावर ने हिमंत को घर-घर का सदस्य बना दिया और महिलाओं ने ‘मामा’ के नाम पर बीजेपी के पक्ष में जमकर वोटिंग की।
‘मियां’ पॉलिटिक्स: अस्मिता की रक्षा और शार्प ध्रुवीकरण?
अगर ‘मामा’ शब्द में अपनापन था, तो ‘मियां’ शब्द का इस्तेमाल हिमंत ने एक धारदार हथियार की तरह किया। असम की डेमोग्राफी और बांग्लादेशी घुसपैठ एक पुराना और सेंसिटिव मुद्दा है। हिमंत बिस्वा सरमा ने इस मुद्दे पर ‘नो कॉम्प्रोमाइज’ वाली छवि बनाई। उन्होंने अपनी रैलियों में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में ‘मियां पॉलिटिक्स’ को टारगेट किया और इसे असमिया संस्कृति के लिए खतरा बताया।
हिमंत का यह नैरेटिव बहुत पावरफुल साबित हुआ कि “अगर अपनी जमीन और पहचान बचानी है, तो स्वदेशी लोगों को एकजुट होना होगा.” उन्होंने मदरसों को बंद करने से लेकर लैंड जिहाद के खिलाफ सख्त स्टैंड लिया, जिसने हिंदू और स्वदेशी असमिया मतदाताओं को पूरी तरह बीजेपी की ओर शिफ्ट कर दिया। कांग्रेस इस पिच पर पूरी तरह क्लीन बोल्ड हो गई। कांग्रेस जैसे ही सेक्युलरिज्म की बात करती, बीजेपी उसे ‘मियां तुष्टीकरण’ का लेबल लगा देती। इस हाइपर लोकल पोलराइजेशन ने विपक्ष के वोटों के गणित को पूरी तरह बिगाड़ दिया।

सिर्फ इमोशन और ध्रुवीकरण से जीत नहीं मिलती, जनता को रिजल्ट भी चाहिए। हिमंत ने खुद को एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जो 24/7 काम करता है। चाहे वह सड़कों का जाल बिछाना हो, नए मेडिकल कॉलेज खोलना हो या युवाओं को बिना रिश्वत के सरकारी नौकरियां देना हो, हिमंत का डिलीवरी सिस्टम बेमिसाल रहा।

आप की राय

How Is My Site?
Latest news

Untitled

Related news